Tuesday, 5 April 2016

April 5, 2016

ज़रूरी नहीं की आप हर जगह सही या गलत या झूठ या सच का अवलोकन  करें।
क्योंकि आपके मन में जो सत्य दिख रहा है वो शायद सत्य हो ही ना , एक छलावा भी तो हो सकता है।
और जो आप जिसे झूठ समझ रहें हैं वो ही असलियत में सही हो।

वास्तविकता में कुदरत के कुछ नियम हैं और अगर हम अपने आस पास नज़र दौड़ाएं तो ज्ञात होगा की कभी कुदरत ने सच्चे और झूठे के बीच फरक नहीं किया, तो फिर ज़रा सोचिये आपको इसका हक़ किसने दे दिया ?

अगर इन दिनों में आप इलाहाबाद में गंगा में स्नान कर लेते हैं तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं। तो भाई जब देवपुत्री माँ गंगा सच्चे और झूठे मैं अंतर नहीं करती तो आप और हम कैसे किसी को सच्चा समझकर दुसरे को झूठा साबित  कर सकते हैं।  

कहने का तात्पर्य यह है की हम अपनी सुविधानुसार किसी को भी सच्चा या झूठा करार दे देते हैं।  आप भली भाँती जानते हैं की सच छुप सकता है पर जो सत्य है वो तो सामने आएगा ही।  तो फिर क्यों किसी को सच और झूठ का पाठ पढ़ाना , उसका एहसास उसपर छोड़ दीजिये ।

हमें सच्चा या झूठा हमारे अपने कर्म बनाते हैं , कर्म  का अर्थ है कर्म, केवल सोच मात्र से कर्म नहीं होता बल्कि उस कर्म में पूरे तन और मन से अगर आप डूब जाते हैं तभी आप सही मतलब समझ पाएंगे।

वैसे बड़ी अद्भुत है यह ज़िन्दगी, लगता है जैसे हम रोज़ इस किताब के पन्ने पड़ते तो हैं पर शायद याद नहीं रख पाते।

~ प्रशांत ~

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